Powered By Blogger

रविवार, 22 जून 2014

मानवता के उपासक भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी -पुण्यतिथि पर कोटि कोटि नमन ,सादर श्रद्धांजली.....


      डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म- 6 जुलाई, 1901को प्रसिद्ध बंगाली परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम जोगमाया देवी मुखर्जी था और पिता आशुतोष मुखर्जी बंगाल के एक जाने-माने व्यक्ति और कुशल वकील थे.23 जून, 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। 
  जिस प्रकार हैदराबाद को भारत में विलय करने का श्रेय सरदार पटेल को जाता है, ठीक उसी प्रकार बंगाल, पंजाब और कश्मीर के अधिकांश भागों को भारत का अभिन्न अंग बनाये रखने की सफलता प्राप्ति में डॉ. मुखर्जी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। एक महान शिक्षाविद और चिन्तक होने के साथ साथ भारतीय जनसंघ के संस्थापक भी थे। उन्हें आज भी एक प्रखर राष्ट्रवादी और कट्टर देशभक्त के रूप में याद किया जाता है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक और सिद्धांतों के पक्के इंसान थे। संसद में उन्होंने सदैव राष्ट्रीय एकता की स्थापना को ही अपना प्रथम लक्ष्य रखा था। संसद में दिए अपने भाषण में उन्होंने पुरजोर शब्दों में कहा था कि "राष्ट्रीय एकता के धरातल पर ही सुनहरे भविष्य की नींव रखी जा सकती है।" भारतीय इतिहास में उनकी छवि एक कर्मठ और जुझारू व्यक्तित्व वाले ऐसे इंसान की है, जो अपनी मृत्यु के इतने वर्षों बाद भी अनेक भारतवासियों के आदर्श और पथप्रदर्शक हैं। 
 डॉ. मुखर्जी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्रथम श्रेणी में 1921 में प्राप्त की थी। इसके बाद उन्होंने 1923 में एम.ए. और 1924 में बी.एल. किया। वे 1923 में ही सीनेट के सदस्य बन गये थे। उन्होंने अपने पिता की मृत्यु के बाद कलकता उच्च न्यायालय में एडवोकेट के रूप में अपना नाम दर्ज कराया। बाद में वे सन 1926 में 'लिंकन्स इन' में अध्ययन करने के लिएइंग्लैंड चले गए और 1927 में बैरिस्टर बन गए।

   वे हिन्दुओं के प्रवक्ता के रूप में उभरे और शीघ्र ही 'हिन्दू महासभा' में शामिल हो गए। सन 1944 में वे इसके अध्यक्ष नियुक्त किये गए थे।

राष्ट्रीय एकात्मता एवं अखण्डता के प्रति आगाध श्रद्धा ने ही डॉ. मुखर्जी को राजनीति के समर में झोंक दिया। अंग्रेज़ों की 'फूट डालो व राज करो' की नीति ने 'मुस्लिम लीग' को स्थापित किया था। डॉ. मुखर्जी ने 'हिन्दू महासभा' का नेतृत्व ग्रहण कर इस नीति को ललकारा। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उनके हिन्दू महासभा में शामिल होने का स्वागत किया, क्योंकि उनका मत था कि हिन्दू महासभा में मदन मोहन मालवीय जी के बाद किसी योग्य व्यक्ति के मार्गदर्शन की जरूरत थी। कांग्रेस यदि उनकी सलाह को मानती तो हिन्दू महासभा कांग्रेस की ताकत बनती तथा मुस्लिम लीग की भारत विभाजन की मनोकामना पूर्ण नहीं होती।

महात्मा गांधी की हत्या के बाद डॉ. मुखर्जी चाहते थे कि हिन्दू महासभा को केवल हिन्दुओं तक ही सीमित न रखा जाए अथवा यह जनता की सेवा के लिए एक गैर-राजनीतिक निकाय के रूप में ही कार्य न करे। वे 23 नवम्बर, 1948 को इस मुद्दे पर इससे अलग हो गए। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अंतरिम सरकार में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में सम्मिलित किया था। डॉ. मुखर्जी ने लियाकत अली ख़ान के साथ दिल्ली समझौते के मुद्दे पर 6 अप्रैल, 1950 को मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। मुखर्जी जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संघचालक गुरू गोलवलकर जी से परामर्श करने के बाद 21 अक्तूबर, 1951 को दिल्ली में 'भारतीय जनसंघ' की नींव रखी और इसके पहले अध्यक्ष बने। सन 1952 के चुनावों में भारतीय जनसंघ ने संसद की तीन सीटों पर विजय प्राप्त की, जिनमें से एक सीट पर डॉ. मुखर्जी जीतकर आए। उन्होंने संसद के भीतर 'राष्ट्रीय जनतांत्रिक पार्टी' बनायी, जिसमें 32 सदस्यलोक सभा तथा 10 सदस्य राज्य सभा से थे, हालांकि अध्यक्ष द्वारा एक विपक्षी पार्टी के रूप में इसे मान्यता नहीं मिली।

    जिस समय अंग्रेज़ अधिकारियों और कांग्रेस के बीच देश की स्वतंत्रता के प्रश्न पर वार्ताएँ चल रही थीं और मुस्लिम लीग देश के विभाजन की अपनी जिद पर अड़ी हुई थी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस विभाजन का बड़ा ही कड़ा विरोध किया। कुछ लोगों की मान्यता है कि आधे पंजाब और आधे बंगाल केभारत में बने रहने के पीछे डॉ. मुखर्जी के प्रयत्नों का ही सबसे बड़ा हाथ है।

उस समय जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा और अलग संविधान था। वहाँ का मुख्यमंत्री भी प्रधानमंत्री कहा जाता था। लेकिन डॉ. मुखर्जी जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने जोरदार नारा भी दिया कि- एक देश में दो निशान, एक देश में दो प्रधान, एक देश में दो विधान नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे। अगस्त, 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि "या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।"

जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने पर डॉ. मुखर्जी को 11 मई, 1953 में शेख़ अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार ने हिरासत में ले लिया, क्योंकि उन दिनों कश्मीर में प्रवेश करने के लिए भारतीयों को एक प्रकार से पासपोर्ट के समान एक परमिट लेना पडता था और डॉ. मुखर्जी बिना परमिट लिए जम्मू-कश्मीर चले गए थे, जहाँ उन्हें गिरफ्तार कर नजरबंद कर लिया गया। वहाँ गिरफ्तार होने के कुछ दिन बाद ही 23 जून, 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु का खुलासा आज तक नहीं हो सका है। भारत की अखण्डता के लिए आज़ाद भारत में यह पहला बलिदान था। इसका परिणाम यह हुआ कि शेख़ अब्दुल्ला हटा दिये गए और अलग संविधान, अलग प्रधान एवं अलग झण्डे का प्रावधान निरस्त हो गया। धारा 370 के बावजूद कश्मीर आज भारत का अभिन्न अंग बना हुआ है। इसका सर्वाधिक श्रेय डॉ. मुखर्जी को ही दिया जाता है। 

शनिवार, 21 जून 2014

रेल किराया वृद्धि कड़वी दवा : रेलवे की व्यवस्थाओं व् सुविधाओं के विस्तार के लिए पीनी ही पड़ेगी ।

भारतीय रेल पिछले कुछ वर्षो से घाटे में चल रही है। सिर्फ एक ही रास्ता है कि रेलवे की सुविधाओं का उपयोग करने वाले भुगतान करें तभी भारतीय रेल पिछले कुछ वर्षो से घाटे में चल रही है। सिर्फ एक ही रास्ता है कि रेलवे की सुविधाओं का उपयोग करने वाले भुगतान करें तभी रेल चल सकती है। पिछले कुछ वर्षों से यात्री सेवाओं से होने वाले नुकसान की भरपाई माल भाड़े से की जाती रही  है,इस कारण  माल भाडे पर भी काफी  दबाव बन गया है। यात्री  किराया वं मालभाड़ों में यह वृद्धि ईधन समायोजन घटक (एफएसी) की वृद्धि को मिलाकर है। पांच फरवरी को जब तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार सत्ता में थी तब रेलवे बोर्ड ने माल भाडे में पांच प्रतिशत और यात्री किराए में 10 प्रतिशत वृद्धि का प्रस्ताव किया था। यह प्रस्ताव रेलवे के माल भाडे और यात्री किराए को तर्कसंगत बनाने के लिए किया गया था और माले भाडे में एक अपे्रल से तथा यात्री किराए में एक मई से बढ़ोत्तरी होनी थी।तब तक अंतरिम बजट भी नहीं आया था लेकिन, ऎसी उम्मीद की जा रही थी कि एक मई तक आम चुनाव संपन्न हो जाएंगे। रेलवे के इस प्रस्ताव में कहा गया था कि इस वृद्धि से उसे 7 हजार 900 करोड़ रूपए का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होगा। इस निर्णय को लेकर तत्कालीन रेल मंत्री मलिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से 11 फरवरी को भेंट की थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस वृद्धि को मंजूरी दे दी थी और सुझाव दिया था कि माल भाड़ा और यात्री किराया वृद्धि को एक मई से लागू किया जाना चाहिए।
  रेलवे बोर्ड ने आम चुनाव परिणामों के आने के दिन 16 मई की शाम को किराया वृद्धि की घोषणा की थी। हालांकि, देर शाम तत्कालीन रेल मंत्री ने आम चुनाव में संप्रग की हार के बाद इस वृद्धि को स्थगित करने के लिए कहा। हालांकि तत्कालीन प्रधानमंत्री और रेल मंत्री के निर्णय को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के रेल मंत्री एस. सदानंद गौड़ा ने सिर्फ इसे लागू किया है।
भारतीय रेल आम लोगों का चाहे सबसे बड़ा सहारा हो लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर, परिचालन एवं यात्री सुविधाओं में उम्मीद के अनुरूप सुभारतीय रेल पिछले कुछ वर्षो से घाटे में चल रही है। सिर्फ एक ही रास्ता है कि रेलवे की सुविधाओं का उपयोग करने वाले भुगतान करें तभी भारतीय रेल पिछले कुछ वर्षो से घाटे में चल रही है। सिर्फ एक ही रास्ता है कि रेलवे की सुविधाओं का उपयोग करने वाले भुगतान करें तभी रेल चल सकती है। पिछले कुछ वर्षों से यात्री सेवाओं से होने वाले नुकसान की भरपाई माल भाड़े से की जाती रही  है,इस कारण  माल भाडे पर भी काफी  दबाव बन गया है। यात्री  किराया वं मालभाड़ों में यह वृद्धि ईधन समायोजन घटक (एफएसी) की वृद्धि को मिलाकर है। पांच फरवरी को जब तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार सत्ता में थी तब रेलवे बोर्ड ने माल भाडे में पांच प्रतिशत और यात्री किराए में 10 प्रतिशत वृद्धि का प्रस्ताव किया था। यह प्रस्ताव रेलवे के माल भाडे और यात्री किराए को तर्कसंगत बनाने के लिए किया गया था और माले भाडे में एक अपे्रल से तथा यात्री किराए में एक मई से बढ़ोत्तरी होनी थी।तब तक अंतरिम बजट भी नहीं आया था लेकिन, ऎसी उम्मीद की जा रही थी कि एक मई तक आम चुनाव संपन्न हो जाएंगे। रेलवे के इस प्रस्ताव में कहा गया था कि इस वृद्धि से उसे 7 हजार 900 करोड़ रूपए का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होगा। इस निर्णय को लेकर तत्कालीन रेल मंत्री मलिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से 11 फरवरी को भेंट की थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस वृद्धि को मंजूरी दे दी थी और सुझाव दिया था कि माल भाड़ा और यात्री किराया वृद्धि को एक मई से लागू किया जाना चाहिए।
  रेलवे बोर्ड ने आम चुनाव परिणामों के आने के दिन 16 मई की शाम को किराया वृद्धि की घोषणा की थी। हालांकि, देर शाम तत्कालीन रेल मंत्री ने आम चुनाव में संप्रग की हार के बाद इस वृद्धि को स्थगित करने के लिए कहा। हालांकि तत्कालीन प्रधानमंत्री और रेल मंत्री के निर्णय को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के रेल मंत्री एस. सदानंद गौड़ा ने सिर्फ इसे लागू किया है।
भारतीय रेल आम लोगों का चाहे सबसे बड़ा सहारा हो लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर, परिचालन एवं यात्री सुविधाओं में उम्मीद के अनुरूप सुधार नहीं हो पाया है।  आजादी के बाद 67 वर्षों में हम केवल 11 हजार किलोमीटर रेल नेटवर्क का ही निर्माण कर सके हैं।
करीब 160 साल पहले शुरू की गई रेल सेवा आज पूरे भारत की जीवन रेखा बन गई है। आज करीब 16 लाख कर्मचारियों और 7 हजार से अधिक स्टेशनों के साथ यह विश्व की चौथी सबसे बड़ी रेल सेवा बन गई है। भारतीय रेल प्रतिदिन 11 हजार ट्रेनों का परिचालन करती है जो करीब 65 हजार किलोमीटर रेल मार्ग पर दौड़ती है। आज ट्रेन की सवारी रोजाना ढ़ाई करोड़ से अधिक लोग कर रहे हैं।ऐसी स्थिति  इन यात्रियों को सुविधा व् सुरक्षा मुहैया कराने के लिये ज्यादा उपाय व् संसाधन उपलब्ध करवाने होंगे,और यह सब काम तभी हो  सकेंगे, जब हमारा आर्थिक तंत्र पूर्ण स्वस्थ होगा। बीमार अर्थतंत्र रेलवे को भी नाकारा, सुविधाहीन व् असुरक्षित  देगा।इन सब बातों के  मद्देनजर रेल मंत्री ने कठिन, लेकिन सही निर्णय लिया है। घाटे में चलने वाली रेलवे घटिया सेवा देगी। उसके पास बिल भुगतान के लिए भी संसाधन नहीं होगा। हमे सोचना  है कि हमे  विश्व स्तरीय रेल सेवाएं चाहिए या इसे जीर्णशीर्ण बीमार हाल में रहने दिया जाए। बीमारी का  इलाज दवा  से ही होता है  औ हमें यह कड़वी दवा रेलवे की व्यवस्थाओं व् सुविधाओं के विस्तार के लिए पीनी ही पड़ेगी  ।  नहीं हो पाया है।  आजादी के बाद 67 वर्षों में हम केवल 11 हजार किलोमीटर रेल नेटवर्क का ही निर्माण कर सके हैं।
करीब 160 साल पहले शुरू की गई रेल सेवा आज पूरे भारत की जीवन रेखा बन गई है। आज करीब 16 लाख कर्मचारियों और 7 हजार से अधिक स्टेशनों के साथ यह विश्व की चौथी सबसे बड़ी रेल सेवा बन गई है। भारतीय रेल प्रतिदिन 11 हजार ट्रेनों का परिचालन करती है जो करीब 65 हजार किलोमीटर रेल मार्ग पर दौड़ती है। आज ट्रेन की सवारी रोजाना ढ़ाई करोड़ से अधिक लोग कर रहे हैं।ऐसी स्थिति  इन यात्रियों को सुविधा व् सुरक्षा मुहैया कराने के लिये ज्यादा उपाय व् संसाधन उपलब्ध करवाने होंगे,और यह सब काम तभी हो  सकेंगे, जब हमारा आर्थिक तंत्र पूर्ण स्वस्थ होगा। बीमार अर्थतंत्र रेलवे को भी नाकारा, सुविधाहीन व् असुरक्षित  देगा।इन सब बातों के  मद्देनजर रेल मंत्री ने कठिन, लेकिन सही निर्णय लिया है। घाटे में चलने वाली रेलवे घटिया सेवा देगी। उसके पास बिल भुगतान के लिए भी संसाधन नहीं होगा। हमे सोचना  है कि हमे  विश्व स्तरीय रेल सेवाएं चाहिए या इसे जीर्णशीर्ण बीमार हाल में रहने दिया जाए। बीमारी का  इलाज दवा  से ही होता है  औभारतीय रेल पिछले कुछ वर्षो से घाटे में चल रही है। सिर्फ एक ही रास्ता है कि रेलवे की सुविधाओं का उपयोग करने वाले भुगतान करें तभी भारतीय रेल पिछले कुछ वर्षो से घाटे में चल रही है। सिर्फ एक ही रास्ता है कि रेलवे की सुविधाओं का उपयोग करने वाले भुगतान करें तभी रेल चल सकती है। पिछले कुछ वर्षों से यात्री सेवाओं से होने वाले नुकसान की भरपाई माल भाड़े से की जाती रही  है,इस कारण  माल भाडे पर भी काफी  दबाव बन गया है। यात्री  किराया वं मालभाड़ों में यह वृद्धि ईधन समायोजन घटक (एफएसी) की वृद्धि को मिलाकर है। पांच फरवरी को जब तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार सत्ता में थी तब रेलवे बोर्ड ने माल भाडे में पांच प्रतिशत और यात्री किराए में 10 प्रतिशत वृद्धि का प्रस्ताव किया था। यह प्रस्ताव रेलवे के माल भाडे और यात्री किराए को तर्कसंगत बनाने के लिए किया गया था और माले भाडे में एक अपे्रल से तथा यात्री किराए में एक मई से बढ़ोत्तरी होनी थी।तब तक अंतरिम बजट भी नहीं आया था लेकिन, ऎसी उम्मीद की जा रही थी कि एक मई तक आम चुनाव संपन्न हो जाएंगे। रेलवे के इस प्रस्ताव में कहा गया था कि इस वृद्धि से उसे 7 हजार 900 करोड़ रूपए का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होगा। इस निर्णय को लेकर तत्कालीन रेल मंत्री मलिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से 11 फरवरी को भेंट की थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस वृद्धि को मंजूरी दे दी थी और सुझाव दिया था कि माल भाड़ा और यात्री किराया वृद्धि को एक मई से लागू किया जाना चाहिए।
  रेलवे बोर्ड ने आम चुनाव परिणामों के आने के दिन 16 मई की शाम को किराया वृद्धि की घोषणा की थी। हालांकि, देर शाम तत्कालीन रेल मंत्री ने आम चुनाव में संप्रग की हार के बाद इस वृद्धि को स्थगित करने के लिए कहा। हालांकि तत्कालीन प्रधानमंत्री और रेल मंत्री के निर्णय को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के रेल मंत्री एस. सदानंद गौड़ा ने सिर्फ इसे लागू किया है।
भारतीय रेल आम लोगों का चाहे सबसे बड़ा सहारा हो लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर, परिचालन एवं यात्री सुविधाओं में उम्मीद के अनुरूप सुधार नहीं हो पाया है।  आजादी के बाद 67 वर्षों में हम केवल 11 हजार किलोमीटर रेल नेटवर्क का ही निर्माण कर सके हैं।
करीब 160 साल पहले शुरू की गई रेल सेवा आज पूरे भारत की जीवन रेखा बन गई है। आज करीब 16 लाख कर्मचारियों और 7 हजार से अधिक स्टेशनों के साथ यह विश्व की चौथी सबसे बड़ी रेल सेवा बन गई है। भारतीय रेल प्रतिदिन 11 हजार ट्रेनों का परिचालन करती है जो करीब 65 हजार किलोमीटर रेल मार्ग पर दौड़ती है। आज ट्रेन की सवारी रोजाना ढ़ाई करोड़ से अधिक लोग कर रहे हैं।ऐसी स्थिति  इन यात्रियों को सुविधा व् सुरक्षा मुहैया कराने के लिये ज्यादा उपाय व् संसाधन उपलब्ध करवाने होंगे,और यह सब काम तभी हो  सकेंगे, जब हमारा आर्थिक तंत्र पूर्ण स्वस्थ होगा। बीमार अर्थतंत्र रेलवे को भी नाकारा, सुविधाहीन व् असुरक्षित  देगा।इन सब बातों के  मद्देनजर रेल मंत्री ने कठिन, लेकिन सही निर्णय लिया है। घाटे में चलने वाली रेलवे घटिया सेवा देगी। उसके पास बिल भुगतान के लिए भी संसाधन नहीं होगा। हमे सोचना  है कि हमे  विश्व स्तरीय रेल सेवाएं चाहिए या इसे जीर्णशीर्ण बीमार हाल में रहने दिया जाए। बीमारी का  इलाज दवा  से ही होता है  और हमें यह कड़वी दवा रेलवे की व्यवस्थाओं व् सुविधाओं के विस्तार के लिए पीनी ही पड़ेगी  । 

बुधवार, 3 जुलाई 2013

खाद्य सुरक्षा अध्यादेश :कांग्रेस की खावो. खिलावो,सत्ता पावो राजनीती

  खाद्य सुरक्षा अध्यादेश को कैबिनेट की मंजूरी दे दी गई है। अब अध्यादेश को सीधे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। राष्ट्रपति से हरी झंडी मिलने के बाद ये अध्यादेश लागू हो जाएगा।
  सोनिया गांधी 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को पुन:सत्तासीन करने के लिए खाद्य सुरक्षा बिल को शीघ्र लागू करवाना चाहती थी । किन्तु उनके सहयोगी दलों का भी यह कहना था कि सरकार इस बिल पर पहले संसद में चर्चा करें, उसके बाद बिल को मंजूरी दी जावे, लेकिन सरकार ने दूसरा रास्ता अपनाते हुए खाद्य सुरक्षा अध्यादेश को कैबिनेट की मंजूरी दे दी है।
  कांग्रेस की इच्छा देश के कमजोर व् गरीब परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने की नहीं बल्कि  उन्हें अकर्मण्य,नाकारा व भिखमंगा बनाने की है .कांग्रेस को उनकी गरीबी या भूख की परवाह  नही बल्कि अपनी वोट बैंक बढ़ाने की ज्यादा चिंता है .अगर कांग्रेस को गरीबों की इतनी ही चिंता होती और ईमानदारी से गरीबी हटाने का प्रयास करती तो भारत से गरीबी कभी की समाप्त हो चुकी होती .लेकिन कान्ग्रेस जानती है की भारत से  गरीबी जिस दिन समाप्त हो जाएगी,कांग्रेस भी सत्ता में नही रह पायेगी .

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

भारतीय जनता पार्टी के हंगामे के बाद संसद में पारित हुआ पाकिस्तान के खिलाफ निंदा प्रस्ताव

अफजल गुरु की फांसी पर पाकिस्तानी नैशनल असेंबली में निंदा प्रस्ताव पारित किए जाने से भारत नाराज है, भारत ने लोकसभा और राज्यसभा में सर्वसम्मति से पाकिस्तान के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया । संसद ने पाकिस्तान को उकसाने वाली हरकत न करने की नसीहत भी दी। इसके अलावा पाकिस्तान के साथ हॉकी मैचों की सीरीज भी रद्द कर दी गई है।

भारतीय जनता पार्टी  ने पाकिस्तानी संसद में पारित प्रस्ताव को मुद्दा बनाते हुए लोकसभा में जोरदार हंगामा किया और दोनों सदनों में चर्चा की मांग की। लोकसभा में यशवंत सिन्हा और राज्यसभा में प्रकाश जावडेकर ने प्रश्नकाल स्थगित कर चर्चा कराने का नोटिस दिया। लोकसभा की कार्यवाही दो बार स्थगित होने के बाद भी मामला शांत न होता देख सदन में पाकिस्तान के खिलाफ प्रस्ताव लाने का फैसला किया गया।

लोकसभा की स्पीकर मीरा कुमार की ओर से पेश प्रस्ताव में पाक संसद के प्रस्ताव पर सख्त ऐतराज जताया गया और साफ कर दिया गया कि पाक द्वारा अवैध रूप से कब्जाए गए हिस्से (पीओके) सहित पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और हमेशा रहेगा। इस प्रस्ताव को लोकसभा ने एक स्वर में पारित कर दिया। मीरा कुमार ने कहा,'आतंकवाद पर पाकिस्तान ऐसी करतूतों से बचे। भारतीय संसद पाकिस्तान की इस हरकत की निंदा करती है। पाकिस्तान भारत के आंतरिक मामले में कतई दखलअंदाजी न करे। यह भारत को बिलकुल भी स्वीकार्य नहीं है। भारतीय जनता पार्टी के हंगामे के बाद संसद में पारित हुआ  पाकिस्तान  के खिलाफ निंदा प्रस्ताव 

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

महान क्रन्तिकारी चन्द्र शेखर आजाद की पुण्य तिथि पर शत शत नमन


चंद्रशेखर आजाद
जन्म : 23 जुलाई, 


मृत्यु : 27 फरवरी, 19311920-21 के वर्षों में वे गाँधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े। वे गिरफ्तार हुए और जज के समक्ष प्रस्तुत किए
 गए, जहाँ उन्होंने अपना नाम 'आजाद', पिता का
 नाम 'स्वतंत्रता', और जेल को उनका निवास बताया। उन्हें 15 कोड़ों की सजा दी गई।
चन्द्रशेखर आज़ाद ने अपने स्वभाव के बहुत से 

गुण अपने पिता पं० सीताराम तिवारी से प्राप्त किये। तिवारी जी साहसी, स्वाभिमानी, हठी और 
वचन के पक्के थे। वे न दूसरों पर जुल्म कर सकते थे और न स्वयं जुल्म सहन कर सकते थे। भाँवरा में उन्हें एक सरकारी बगीचे में चौकीदारी का काम मिला हुआ था। भूखे भले ही बैठे रहें पर बगीचे से एक भी फल तोड़कर न तो स्वयं खाते थे और न ही किसी और को खाने देते थे। एक बार तहसीलदार ने बगीचे से फल तुड़वाना चाहे तो तिवारी जी बिना पैसे दिये फल तुड़वाने पर तहसीलदार से झगड़ा करने को तैयार हो गये। इसी जिद में उन्होंने वह नौकरी भी छोड़ दी। एक बार तिवारी जी की पत्नी पडोसी के यहाँ से नमक माँग लायीं इस पर तिवारी जी ने उन्हें बहुत डाँटा और इसकी सामूहिक सजा स्वरूप चार दिन तक परिवार में सबने बिना नमक के भोजन किया। ईमानदारी और स्वाभिमान के ये गुण बालक चन्द्रशेखर ने अपने पिता से विरासत में सीखे थे

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

कृष्ण कुमार सोनी (रामबाबू) : केंद्र सरकार बर्बाद कर रही है जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा .

कृष्ण कुमार सोनी (रामबाबू) : केंद्र सरकार बर्बाद कर रही है जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा .
एक तरफ तो सरकार आम नागरिक पर कई तरह के नए नए टैक्स का बोझ लड़ रही है, दूसरी  और जनता द्वारा जमा कराया गया टैक्स जो की उसकी कड़ी मेहनत द्वारा कमाया गया होता हे, और जिसे वह ईमानदारी से टैक्स के रूप में जमा करता है,उस पैसे का केंद्र सरकार अपना वोट बैंक बढाने के लिए अनावश्यक योजनायें चलाकर दुरुपयोग कर रही है.

वीर विनायक दामोदर सावरकर की पुण्य स्मृति पर शत शत नमन


वीर विनायक दामोदर सावरकर की पुण्य स्मृति पर शत शत नमन
जन्म- 28 मई, 1883, भगूर गाँव, नासिक
मृत्यु- 26 फ़रवरी,1966, मुम्बई, भारत
- वीर सावरकर न सिर्फ़ एक क्रांतिकारी थे बल्कि एक भाषाविद, बुद्धिवादी, कवि, अप्रतिम क्रांतिकारी, दृढ राजनेता, समर्पित समाज सुधारक, दार्शनिक, द्रष्टा, महान कवि और महान इतिहासकार और ओजस्वी आदि वक्ता भी थे। उनके इन्हीं गुणों ने महानतम लोगों की श्रेणी में उच्च पायदान पर लाकर खड़ा कर दिया।
-वीर सावरकर भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के केन्द्र लंदन में उसके विरूद्ध क्रांतिकारी आंदोलन संगठित किया था।
-वीर सावरकर भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सन् 1905 के बंग-भंग के बाद सन् 1906 में 'स्वदेशी' का नारा दे, विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी।
-वीर सावरकर भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्हें अपने विचारों के कारण बैरिस्टर की डिग्री खोनी पड़ी।
-वीर सावरकर पहले भारतीय थे जिन्होंने पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की।
-वीर सावरकर भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सन् 1857 की लड़ाई को भारत का 'स्वाधीनता संग्राम' बताते हुए लगभग एक हज़ार पृष्ठों का इतिहास 1907 में लिखा।
-वीर सावरकर भारत के पहले और दुनिया के एकमात्र लेखक थे जिनकी किताब को प्रकाशित होने के पहले ही ब्रिटिश और ब्रिटिशसाम्राज्यकी सरकारों ने प्रतिबंधित कर दिया था।
-वीर सावरकर दुनिया के पहले राजनीतिक कैदी थे, जिनका मामला हेग के अंतराष्ट्रीय न्यायालय में चला था।
-वीर सावरकर पहले भारतीय राजनीतिक कैदी थे, जिसने एक अछूत को मंदिर का पुजारी बनाया था।
-वीर सावरकर ने ही वह पहला भारतीय झंडा बनाया था, जिसे जर्मनी में 1907 की अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में मैडम कामा ने फहराया था।
-वीर सावरकर वे पहले कवि थे, जिसने कलम-काग़ज़ के बिना जेल की दीवारों पर पत्थर के टुकड़ों से कवितायें लिखीं। कहा जाता है उन्होंने अपनी रची दस हज़ार से भी अधिक पंक्तियों को प्राचीन वैदिक साधना के अनुरूप वर्षोंस्मृति में सुरक्षित रखा, जब तक वह किसी न किसी तरह देशवासियों तक नहीं पहुच गई।